Monday, 2 June 2014

बस.....गुलज़ार साहिब

ऎसा कोई ज़िन्दगी से वादा तो नहीं था,
तेरे बिना जीने का इरादा तो नहीं था...

तेरे लिए रातों में चांदनी उगाई थी,
क्यारियों में ख़ुशबू की रौशनी लगाई थी,
जाने कहाँ टूटी है डोर मेरे ख्वाब की,
ख्वाब से जागेंगे सोचा तो नहीं था...
ऎसा कोई ज़िन्दगी से वादा तो नहीं था,
तेरे बिना जीने का इरादा तो नहीं था...

शामियाने शामों के रोज़ ही सजाये थे,
कितनी उम्मीदों के मेहमां बुलाये थे,
आके दरवाज़े से लौट गए हो,
यूँ भी कोई आएगा सोचा तो नहीं था...
ऎसा कोई ज़िन्दगी से वादा तो नहीं था,
तेरे बिना जीने का इरादा तो नहीं था.....

बस.....गुलज़ार साहिब

ऎसा कोई ज़िन्दगी से वादा तो नहीं था,
तेरे बिना जीने का इरादा तो नहीं था...

तेरे लिए रातों में चांदनी उगाई थी,
क्यारियों में ख़ुशबू की रौशनी लगाई थी,
जाने कहाँ टूटी है डोर मेरे ख्वाब की,
ख्वाब से जागेंगे सोचा तो नहीं था...
ऎसा कोई ज़िन्दगी से वादा तो नहीं था,
तेरे बिना जीने का इरादा तो नहीं था...

शामियाने शामों के रोज़ ही सजाये थे,
कितनी उम्मीदों के मेहमां बुलाये थे,
आके दरवाज़े से लौट गए हो,
यूँ भी कोई आएगा सोचा तो नहीं था...
ऎसा कोई ज़िन्दगी से वादा तो नहीं था,
तेरे बिना जीने का इरादा तो नहीं था.....

ख़ुमार-ए-ग़म है

ख़ुमार-ए-ग़म है महकती फ़िज़ा में जीते हैं,
तेरे ख़याल की आब-ओ-हवा में जीते हैं....

बड़े इत्तफ़ाक़ से मिलते हैं, मिलने वाले मुझे,
वो मेरे दोस्त हैं, तेरी वफ़ा में जीते हैं....

फ़िराक़-ए-यार में साँसों को रोके रखते हैं,
हर एक लम्हा गुज़रती कज़ा में जीते हैं....

न बात पूरी हुई थी, के रात टूट गई,
अधूरे ख़्वाब की, आधी सज़ा में जीते हैं....

तुम्हारी बातों में कोई मसीहा बसता है,
हसीं लबों से बरसती शफ़ा में जीते हैं....

ख़ुमार-ए-ग़म है महकती फ़िज़ा में जीते हैं,
तेरे ख़याल की आब-ओ-हवा में जीते हैं....!!

मेरा जिस्म.....[गुलज़ार साहिब]

मुझे मेरा जिस्म छोड़कर बह गया नदीं में!
अब उस किनारे पहुंच के मुझको बुला रहा है
मैं इस किनारे पे डूबता जा रहा पैहम
मैं कैसे तैरूं बगैर उसके!!
मुझे मेरा जिस्म छोड़कर बह गया नदी में!!

एक ख्याल....

एक ख्याल फेंका है रफ़्तार-ए-बेपनाह से
ख़ुदा के पास जायेगा या उस पार,जो उसके पार गया तो मुझ तक वापस आएगा......

तन पे लगती काँच की बूँदे....

तन पे लगती काँच की बुँदे
मन पे लगे तो जाने
बर्फ से ठंडी आग की बुँदे
दर्द चुगे तो जाने

लाल सुनहरी चिंगारी सी
बेले झूलती रहती है
बहार गुलमोहर की लपटे
दिल में उगे तो जाने

बारिश लम्बे लम्बे हाथों से
जब आकर छूती है
ये लोबान सी सांसें
थोड़ी देर रुके तो जाने

जिसे तुम भटकना कहती हो न मानसी
मैं उसे और जानने की तलाश कहता हूँ
इक और जानने की तलाश
मैं इस जमी पे भटकता हूँ कितनी सदियों से
गिरा वक़्त से कट के लम्हा उसकी तरह
बदन मिला तो कली के लिए भटकता रहा
काँच की बूँदें
तन पे लगती
काँच की बूँदें मन पे लगे तो जाने
तन पे लगती काँच की बुँदे
मन पे लगे तो जाने...

[गुलज़ार साहिब]

£ife journey


Now, there's birth and there's death, But the space in between  Is where the journey takes place and you give it all meaning,You can either live to die or do something with your life. You only live once therefore, you should do the things you love and have no regrets.

For....All philosophy in this world is swinging in between birth and death.