Friday, 25 July 2014

रोज़ रोज़ आँखों तले....

रोज रोज आँखों तले एक ही सपना चले
रात भर काज़ल जले आंख में जिस तरह ख्वाब का दिया जले ......

जब से तुम्हारे नाम की मिश्री होंट लगाई है
मीठा सा गम है और मीठी सी तन्हाई है ....
रोज रोज आँखों तले एक ही सपना चले ............

छोटी सी दिल की उलझन है ये सुलझा दो तुम
जीना तो सिखा है मर के मरना सिखा दो तुम
रोज रोज आँखों तले एक ही सपना चले ........

गुलज़ार साहिब

वो शाम कुछ अजीब थी

वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है
वो कल भी पास पास थी, वो आज भी करीब है

झुकी हुयी निगाहों में, कही मेरा ख़याल था
दबी दबी हंसी में, एक हसीं सा गुलाल था
मैं सोचता था, मेरा नाम गुनगुना रही हैं वो
न जाने क्यों लगा मुझे के मुस्कुरा रही हैं वो

मेरा ख़याल है, अभी झुकी हुयी निगाहों में
खिली हुयी हँसी भी है, दबी हुयी सी चाह में
मैं जानता हूँ, मेरा नाम गुनगुना रही हैं वो
यही ख़याल हैं मुझे के साथ आ रही हैं

रात खामोश है...

रात चुपचाप दबे पांव चली जाती है
रात खामोश है, रोती नहीं, हंसती भी नहीं
कांच का नीला-सा गुंबद है, उड़ा जाता है
खाली खाली कोई बजरा-सा बहा जाता है

चांद की किरनों में वो रोज-सा रेशन भी नहीं
चांद की चिकनी डली है कि घुली जाती है
और सन्नाटों की इक धूल उड़ी जाती है

काश इक बार कभी नींद से उठकर तुम भी
हिज्र की रातों में ये देखो तो क्या होता

[गुलज़ार साहिब]

कच्ची मिट्टी

ये जिस्म है कच्ची मिट्टी का
भर जाये तो रिसने लगता है
बाहों में कोई थामें तो
आग़ोश में घिरने लगता है
ये शहर बड़ा पुराना है...

गुलज़ार साहिब

साँस भारी है

शाम से आज साँस भारी है
बेकरारी है बेकरारी है

आपके बाद हर घड़ी हमने
आपके साथ ही गुज़ारी है

रात को दे दो चाँदनी की रिदा
दिन की चादर अभी उतारी है

कल का हर वाक़या तुम्हारा था
आज की दास्ताँ हमारी है

गुलज़ार साहिब

हाँ वो ही तो....वो ही...

तेरे बिना भी कभी तुझ से मचल लेती हूँ
करवट बदलती हूँ तो सपना बदल लेती हूँ
तेरा ख्याल आए तो बल खा के पल जाता है
पानी की चादर तले तन मेरा जल जाता है
हाँ वहीं वो वहीं ...

तेरे गले मिलने के मौसम बड़े होते हैं
जन्मों का वादा कोई ये ग़म बड़े छोटे हैं
लम्बी सी इक रात हो लम्बा सा इक दिन मिले
बस इतना सा जीना हो मिलन की घड़ी जब मिले
हाँ वहीं वो वहीं ...

गुलज़ार साहिब

जो कहते हो तुम वो तो नहीं

जो दीखते हो वो लगते नहीं
जो लगते हो तुम हो तो नहीं
सब झूठ है जो तुम कहते हो
जो कहते हो तुम वो तो नहीं
झूठे हो झूठे
झूठे हो तुम झूठे

खुद चोटें करते हो दिल पर
और चोट पे मरहम भरते हो
खुद से जो नहीं पूछो मुझसे
क्या करना है क्या करते हो
झूठे हो झूठे
झूठे हो तुम झूठे

पढ़ लो न दिल का दर्द कहीं
अल्फ़ाज़ बदल लेते हो तुम
आँखों में नमी आ जाए तो
आवाज़ बदल लेते हो तुम
झूठे हो झूठे
झूठे हो तुम झूठे

[गुलज़ार साहिब]