Thursday, 8 May 2014

गुलज़ार साहब और ग़ालिब साहब

बहुत बरस पहले गुलज़ार ने मिर्ज़ा ग़ालिब पर एक सीरियल बनाया था, जिसमें नसीरूद्दीन शाह ने ग़ालिब का किरदार निभाया था । जिसमें गुलज़ार ने कॉमेन्‍ट्री की है

पहले जगजीत सिंह की आवाज़ में आता है ये शेर

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्‍छे
कहते हैं कि गालिब का है अंदाज़े बयां और ।।

फिर बांसुरी की विकल तान के बीच गुलज़ार हमें मिर्ज़ा ग़ालिब के घर की तरफ लिये चलते हैं ये बातें कहकर----

बल्‍लीमारान के मुहल्‍ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियां

सामने टाल के नुक्‍कड़ पे बटेरों के

गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वाह

चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के परदे

एक बकरी के मिमियाने की आवाज़

और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अंधेरे, ऐसे दीवारों से मुंह जोड़के चलते हैं यहां

चूड़ीवालान के कटरे की बड़ी बी जैसे, अपनी बुझती हुई आंखों से दरवाज़े टटोलें

इसी बेनूर अंधेरी सी गली-क़ासिम से

एक तरतीब चराग़ों की शुरू होती है

एक क़ुराने सुख़न का सफा खुलता है

असद उल्‍ला ख़ां ग़ालिब का पता मिलता है

इसके बाद आती है जगजीत सिंह की आवाज़ । और जगजीत ने गाये हैं ग़ालिब के ये अनमोल शेर---

हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्‍या है

तुम्‍हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ्तगू क्‍या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल

जब आंख ही से ना टपका तो फिर लहू क्‍या है ।।

चिपक रहा है बदन पे लहू से पैराहन
हमारी जेब को अब हाजत-ऐ-रफ़ू क्‍या है

जला है जिस्‍म जहां दिल भी जल गया होगा

कुरेदते हो जो अब राख, जुस्‍तजू क्‍या है ।।

हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्‍या है

तुम्‍हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ्तगू क्‍या है ।।

Wednesday, 7 May 2014

होटों से छु लो तुम


होंठों से छूलो तुम
मेरा गीत अमर कर दो
बन जाओ मीत मेरे
मेरी प्रीत अमर कर दो

न उमर की सीमा हो
न जनम का हो बंधन
जब प्यार करे कोई
तो देखे केवल मन
नई रीत चलाकर तुम
ये रीत अमर कर दो
होंठों से छूलो तुम  ...

जग ने छीना मुझसे
मुझे जो भी लगा प्यारा
सब जीता किये मुझसे
मैं हर दम ही हारा
तुम हार के दिल अपना
मेरी जीत अमर कर दो
होंठों से छूलो तुम  ...

आकाश का सूनापन
मेरे तनहा मन में
पायल छनकाती तुम
आजाओ जीवन में
साँसें देकर अपनी
संगीत अमर कर दो
होंठों से छूलो तुम

बावरी पिया की


बावरी पिया की
कसे कहे जाके पीर जियकी
बावरी पिया की
पियु रंग मन की चुनर रंगाई
पियु पियु रथ के पियु में समायी
बन गयी छाया
छल बलिया की
बावरी पिया की
इता उठा देखे पंथ निहारे हर दिन पलछिन नाम पुकारे
सूद नहीं बिसरे,
मन बसिया की
बावरी पिया की
कसे कहे जाके पीर जियकी
बावरी पिया की

bawari piya ki (sad)..Baabul.: http://youtu.be/HN6_ZvlV-2s

बावरी पिया की....बाबुल

बावरी पिया की
कसे कहे जाके पीर जियकी
बावरी पिया की

पियु रंग मन की चुनर रंगाई
पियु पियु रथ के पियु में समायी

बन गयी छाया ,
छल बलिया की
बावरी पिया की

इता उठा देखे पंथ निहारे
हर दिन पलछिन नाम पुकारे
सूद नहीं बिसरे ,
मन बसिया की
बावरी पिया की
कसे कहे जाके पीर जियकी
बावरी पिया की

एक में दो ≈ ≈ गुलज़ार



 

एक शरीर में कितने दो हैं,
गिन कर देखो जितने दो हैं।

देखने वाली आँखें दो हैं,
उनके ऊपर भवें भी दो हैं,
सूँघते हैं ख़ुश्बू को जिससे
नाक एक है, नथुने दो हैं।

भाषाएँ हैं सैकड़ों लेकिन,
बोलने वाले होंठ तो दो हैं,
लाखों आवाज़ें सुनते हैं,
सुनने वाले कान तो दो हैं।

कान भी दो, होंठ भी दो हैं,
दाएँ, बाएँ, कन्धे दो हैं,
दो बाहें, दो कोहनियाँ उनकी,
हाथ भी दो, अँगूठे दो हैं।









अमलतास ....गुलज़ार

खिड़की पिछवाड़े को खुलती तो नज़र आता था
वो अमलतास का इक पेड़, ज़रा दूर, अकेला-सा खड़ा था
शाखें पंखों की तरह खोले हुए
एक परिन्दे की तरह
बरगलाते थे उसे रोज़ परिन्दे आकर
सब सुनाते थे वि परवाज़ के क़िस्से उसको
और दिखाते थे उसे उड़ के, क़लाबाज़ियाँ खा के
बदलियाँ छू के बताते थे, मज़े ठंडी हवा के!

आंधी का हाथ पकड़ कर शायद
उसने कल उड़ने की कोशिश की थी
औंधे मुँह बीच-सड़क आके गिरा है!!

यारम ...गुलज़ार साहिब

हम चीज़ हैं बड़े काम की, यारम
हमें काम पे रख लो कभी, यारम
हम चीज़ हैं बड़े काम की, यारम

हो सूरज से पहले जगायेंगे
और अखबार की सब सुर्खियाँ हम
गुनगुनाएँगे
पेश करेंगे गरम चाय फिर
कोई खबर आई न पसंद तो एंड बदल देंगे

हो मुंह खुली जम्हाई पर
हम बजाएं चुटकियाँ
धूप न तुमको लगे
खोल देंगे छतरियां
पीछे पीछे दिन भर
घर दफ्तर में लेके चलेंगे हम

तुम्हारी फाइलें, तुम्हारी डायरी
गाडी की चाबियां, तुम्हारी ऐनकें
तुम्हारा लैपटॉप, तुम्हारी कैप
और अपना दिल, कुंवारा दिल
प्यार में हारा, बेचारा दिल
और अपना दिल, कुंवारा दिल
प्यार में हारा, बेचारा दिल

यह कहने में कुछ रिस्क है, यारम
नाराज़ न हो, इश्क है, यारम

हो रात सवेरे, शाम या दोपहरी
बंद आँखों में लेके तुम्हें ऊंघा करेंगे हम
तकिये चादर महके रहते हैं
जो तुम गए
तुम्हारी खुशबू सूंघा करेंगे हम
ज़ुल्फ़ में फँसी हुई खोल देंगे बालियाँ
कान खिंच जाए अगर
खा लें मीठी गालियाँ
चुनते चलें पैरों के निशाँ
कि उन पर और न पाँव पड़ें

तुम्हारी धडकनें, तुम्हारा दिल सुनें
तुम्हारी सांस सुनें, लगी कंपकंपी
न गजरे बुनें, जूही मोगरा तो कभी दिल
हमारा दिल, प्यार में हारा, बेचारा दिल
हमारा दिल, हमारा दिल
प्यारा में हारा, बेचारा दिल